अमृतसर में ब्रह्म मुहूर्त की परंपरा
अमृतसर का ब्रह्म मुहूर्त 3 बजे का हरमंदिर साहिब है। हरमंदिर साहिब अपने गर्भगृह के द्वार 3 बजे खोलता है — काशी विश्वनाथ के समान घंटे पर — और मंदिर के वंशानुगत रागियों द्वारा आसा दी वार का पाठ शुरू होता है। यह सिख परंपरा का अमृत वेला है: श्री गुरु ग्रंथ साहिब को अकाल तख़्त से हरमंदिर के भीतरी गर्भगृह तक रोज़ की पालकी-यात्रा इसी ठीक घंटे में होती है। लंगर भी इसी समय से चलता है। हरमंदिर से एक किलोमीटर दूर दुर्गियाणा मंदिर 5 बजे पहली आरती करता है और हिंदू ब्रह्म मुहूर्त-कैलेंडर का पालन करता है — दोनों परंपराएँ पैदल दूरी पर सह-अस्तित्व में हैं। 40 किमी दक्षिण-पूर्व गोइंदवाल साहिब गाँव गुरु अमर दास जी की बावली साहिब को सुरक्षित रखता है — 84 सीढ़ियों का पूर्व-भोर डुबकी के लिए उतरना सिख ब्रह्म मुहूर्त-परंपरा है। अकाल तख़्त की 5 बजे की प्रातः अरदास मंदिर के वरिष्ठ ग्रंथियों और गुरुद्वारा प्रबंधकों को एक करती है। हरमंदिर के पास जलियाँवाला बाग़ 13 अप्रैल की 1919 की वार्षिकी पर ब्रह्म मुहूर्त में शांत नागरिक-दर्शन देखता है।
